आगे कड़ी और लंबी लड़ाई है
जो लोग सीपीआइ (एम) तथा प. बंगाल में वामपंथ के लिए मृत्युलेख लिखने में लगे हुए हैं, इस तथ्य को भूल ही जाते हैं कि इस हार में भी वाम मोर्चा को राज्य में पड़े कुल वोट में से 41 फीसद से ज्यादा हिस्सा मिला है। यह एक प्रभावशाली जनाधार है। यह जनाधार, पिछले दो वर्षों में सी पी आइ (एम) तथा वामपंथ पर बढ़ते हमलों के बावजूद कायम रहा है।... घोर-कम्युनिस्टविरोधी और नव-उदारवादी टिप्पणीकार गलत साबित होंगे। माकपा तथा वामपंथ जनता के उन तबकों को फिर से अपने साथ जोडऩे के लिए संघर्ष करेंगे, जो उनसे अलग हो गए हैं। इन तबकों के हितों के सवालों को उठाया जाएगा और उनके लिए संघर्ष किया जाएगा।
प्रकाश कारात
पश्चिम बंगाल के विधानसभाई चुनाव में वाम मोर्चा की भारी हार हुई है। इससे देश की वामपंपथी, जनतांत्रिक तथा प्रगतिशील ताकतों को बड़ी निराशा हुई है, जो पश्चिम बंगाल को वामपंथ का गढ़ मानती हैं। वाम मोर्चा सरकार के 34 वर्ष रहने के बाद और 1977 से लगाकर एक के बाद एक लगातार सात चुनाव जीतने के बाद, सी पी आइ (एम) के नेतृत्ववाले वाम मोर्चा को सत्ता से हटाया गया है। इस जनादेश की कुछ आम विशेषताएं खासतौर पर साफतौर पर देखी जा सकती हैं। जनता ने निर्णायक रूप से बदलाव के पक्ष में फैसला लिया है और तृणमूल कांग्रेस के गठजोड़ को जबर्दस्त जीत दिलायी है। धुर-दक्षिणपंथ से लेकर अतिवामपंथ में माओवादियों तक, तमाम वामपंथविरोधी ताकतें इस चुनाव में पूरी तरह से एकजुट हो गयी थीं। यह भी स्वत:स्पष्ट है कि पिछले दो साल में प. बंगाल में वाम मोर्चा अपने खोए हुए जनाधार को उस हद तक दोबारा हासिल नहीं कर पाया, जिस हद तक हम उम्मीद कर रहे थे।
आलोचनात्मक समीक्षा
सीपीआइ (एम) चुनाव नतीजों की चौतरफा समीक्षा करेगी ताकि उन कारणों की पहचान की जा सके जिनके चलते वाम मोर्चा के समर्थन में कमी आयी है और बंगाल में राजनीतिक हालात में बदलाव आया है। हालांकि, इस चुनाव में वाम मोर्चा 2009 के लोकसभाई चुनाव के मुकाबले 11 लाख वोट ज्यादा हासिल करने में कामयाब रहा, फिर भी कुल वोट में उसके हिस्से में लोकसभा के चुनाव के मुकाबले 2. 2 फीसद की गिरावट आयी है। वामपंथ के तीन दशक के शासन की शानदार उपलब्धियों के बावजूद, सरकार के लंबे अर्से तक बने रहने से कुछ नकारात्मक कारक भी एकत्र हो गए थे। पार्टी के राजनीतिक व सांगठनिक काम के संदर्भ में रखकर, चुनाव नतीजों की आलोचनात्मक समीक्षा के जरिए हम, ऐसे कदम तय कर पाएंगे जिनके सहारे हम अपने रुख की खामियों को दूर सकते हैं और सांगठनिक कमजोरियों का उपचार कर सकते हैं।
उधर केरल में एलडीएफ अब तक के सबसे मामूली अंतर से हारा है। वह बहुमत से सिर्फ तीन सीट पीछे रह गया है। यूडीएफ दो सीट की बढ़त से किसी तरह जीत दर्ज कराने में कामयाब रहा है। यूडीएफ और एलडीएफ के वोट के हिस्से में कुल 0.89 फीसद का अंतर रहा है। इससे पता चलता है कि राज्य की जनता आमतौर पर एलडीएफ सरकार के रिकार्ड से संतुष्टï थी और यहां किसी तरह का सत्तारूढ़ताविरोधी कारक काम नहीं कर रहा था। मुख्यमंत्री वी एस अच्युतानंदन के भ्रष्टाचारविरोधी अभियान को भी जनता का अनुमोदन हासिल हुआ है। शुरूआती रिपोर्टें यह दिखाती हैं कि जनता के एक हिस्से पर कुछ जातिवादी व धार्मिक संस्थाओं को जो प्रभाव हासिल है, उसने ही इस चुनाव में एलडीएफ की जीत का रास्ता रोका है। केंद्र में यूपीए सरकार के अंतर्गत भ्रष्टाचार तथा महंगाई का जो रिकार्ड रहा है उसके चलते भी, जनता का बड़ा हिस्सा यूडीएफ की ओर खिंचने से दूर ही रहा था।
स्वार्थप्रेरित हमले
पश्चिम बंगाल की हार के बाद नैगम मीडिया में सी पी आइ (एम) तथा वामपंथ के खिलाफ प्रचार की बाढ़ आ गयी है। कहा जा रहा है कि ये चुनाव नतीजे सी पी आइ (एम) के लिए सर्वनाश के सूचक हैं और पार्टी इस पराभव से अब कभी उबर नहीं पाएगी। इसी क्रम में कुछ टिप्पणीकारों ने हमले की यह दिशा पकड़ी है कि कम्युनिस्ट विचारधारा तो पहले ही पुरानी पडऩे के चलते अप्रासांगिक हो चुकी थी और इस बार का विधानसभाई चुनाव का जनादेश, दुनिया भर में समाजवाद तथा मार्क्सवाद की प्रासंगिकता के खत्म होने की प्रक्रिया का ही चरमोत्कर्ष है।
ये सरासर झूठे दावे हैं। इस बात की सचाई इस तथ्य से समझी जा सकती है कि सोवियत संघ के पराभव पर सी पी आइ (एम) पर कोई वास्तविक प्रभाव नहीं पड़ा था। वास्तव में पिछली सदी के नव्बे के दशक में पश्चिम बंगाल तथा केरल, दोनों में ही पार्टी का तेजी से फैलाव तथा विकास हुआ था। जहां तक विचारधारा का सवाल है, सी पी आइ (एम), भारत की ठोस परिस्थितियों में रचनात्मक रूप से उसका व्यवहार करने के अर्थ में ही, मार्क्सवाद के सिद्घांत तथा व्यवहार को अपना आधार बनाती है। यह कोई अचल रुख नहीं है बल्कि एक निरंतर विकसनशील रुख है।
प. बंगाल में सी पी आइ (एम) तथा के वाम मोर्चा का निर्माण व विकास, चार दशक से ज्यादा में फैले अनगिनत संघर्षों व जनांदोलनों के बीच से हुआ है। वाम मोर्चा की चुनावी सफलता, इस तरह के आंदोलनों व संधर्षों से निर्मित जनाधार का ही नतीजा है। न तो बंगाल वाम मोर्चा सिर्फ एक चुनावी गठबंधन है और न सी पी आइ (एम) सिर्फ अपनी चुनावी गतिविधियों के बल पर एक शक्तिशाली जन पार्टी के रूप में बढ़ी तथा विकसित हुई है।
लोग सीपीआइ (एम) तथा प. बंगाल में वामपंथ के लिए मृत्युलेख लिखने में लगे हुए हैं, इस तथ्य को भूल ही जाते हैं कि इस हार में भी वाम मोर्चा को राज्य में पड़े कुल वोट में से 41 फीसद से ज्यादा हिस्सा मिला है। एक करोड़ 95 लाख से ज्यादा लोगों ने वाम मोर्चा के पक्ष में वोट दिया है और उसे अपना समर्थन दिया है। यह एक प्रभावशाली जनाधार है। यह जनाधार, पिछले दो वर्षों में सी पी आइ (एम) तथा वामपंथ पर बढ़ते हमलों के बावजूद कायम रहा है। यह मेहनतकश जनता के बीच कायम वर्गीय आधार है। घोर-कम्युनिस्टविरोधी और नव-उदारवादी टिप्पणीकार गलत साबित होंगे। सी पी आइ (एम) तथा वामपंथ धीरज के साथ जनता के उन तबकों को फिर से अपने साथ जोडऩे के लिए संघर्ष करेंगे, जो उनसे अलग हो गए हैं। इन तबकों के हितों के सवालों को उठाया जाएगा और उनके लिए संघर्ष किया जाएगा।
हमले का एक और रूप है, वाम मोर्चा के परे रिकार्ड को ही बदनाम करने की कोशिश करना और सी पी आइ (एम) का एक ऐसी ताकत के रूप में दानवीकरण करना, जो जनता का दमन करती आ रही थी। कुछ लोग तो यह दावा करने की हद तक चले गए हैं कि वाम मोर्चा की पिछली जीतें भी, सी पी आइ (एम) का विरोध करने या उसकी इच्छा के खिलाफ चलने वालों का दमन करने के आधार पर हासिल की गयी जीतें थीं। ये आलोचक बड़ी आसानी से यह भूल जाते हैं कि 1977 से लगाकर हरेक विधानसभाई चुनाव में वामपंथविरोधी विपक्ष, हर बार कम से कम 40 फीसद वोट हासिल करती आयी थीं। इसके बावजूद, अगर सी पी आइ (एम) तथा वाम मोर्चा का इन सभी चुनावों में जनता के वोट का 45 से 50 फीसद तक हिस्सा हासिल करने का शानदार रिकार्ड रहा था, यह जनता के बीच उनकी गहरी जड़ों का और खासतौर पर ग्रामीण जनता के बीच उन्हें हासिल जबर्दस्त जनसमर्थन का ही फल था। सी पी आइ (एम) कार्यकर्ताओं को निरंकुश तथा भ्रष्ट बनाकर पेश करने के जरिए बदनाम करना, हमारी पार्टी को निरस्त्र करने की स्वार्थप्रेरित कोशिश का ही हिस्सा है। आखिरकार, समर्पित तथा निस्वार्थ कार्यकर्ता ही तो हमारी पार्टी की रीढ़ हैं।
इसके साथ ही जोड़कर यह आरोप भी लगाया जाता है कि पश्चिम बंगाल की वाम मोर्चा सरकार एक अंतर्निहित रूप से ही जनतंत्रविरोधी तथा तानाशाहीपूर्ण व्यवस्था थी, जिसने असहमति की सारी आवाजों को कुचल दिया था और पश्चिम बंगाल के समाज को एक कठोर शिकंजे में कस दिया था। वाम मोर्चा ने जनता के जनादेश के आधार पर शासन किया है और इसके लिए उसने खुद को लगातार संसदीय जनतांत्रिक व्यवस्था के तहत जनतांत्रिक प्रक्रिया की कसौटी पर कसा है। सी पी आइ (एम) और वामपंथ ने साबित किया है कि वे जनतंत्र के पक्ष में काम करने वाली सबसे अविचल शक्ति हैं। 1957 में केरल में कम्युनिस्ट पार्टी के चुनाव में जीतने और देश में पहली कम्युनिस्ट सरकार बनाने के बाद से ही कम्युनिस्ट, अवाम के विशाल हिस्सों को जनतांत्रिक प्रक्रिया में खींचने के जरिए, जनतंत्र में नयी जान फूंकने में लगे रहे हैं। यह संयोग ही नहीं है कि हमारे देश में सबसे ज्यादा मतदान पश्चिम बंगाल, केरल तथा त्रिपुरा में ही होता है। देश के यही तीन राज्य हैं जहां भूमि सुधारों ने पुरानी भूस्वामी व्यवस्था के ढांचे को तोड़ा है और जनतंत्र का विस्तार किया है। इन राज्यों में पंचायती राज संस्थाओं में नयी जान फूँकी गयी है। प्रभुत्वशाली वर्गों तथा निहित स्वार्थों के दलाल ही हैं जो वामपंथ के इस जनतांत्रिक रिकार्ड पर कालिख मलने की और उसे बदनाम करने की कोशिश करते हैं।
वामपंथी सरकारों की भूमिका
सी पी आइ (एम) ने, जहां कहीं भी उसे जनता का समर्थन मिल पाए, राज्य सरकारें चलाने के लिए अपना ही रुख विकसित किया है। इसके तहत वामपंथी नेतृत्ववाली सरकारों को इस तरह चलाना होता है, जिससे वामपंथी व जनतांत्रिक आंदोलन को और मेहनतकश जनता के आंदोलन को बल मिले। हमारी पार्टी के कार्यक्रम में यह सूत्रबद्घ किया गया है कि इस तरह की सरकारों को जनता को राहत दिलाने का कार्यक्रम चलाना चाहिए और वैकल्पिक नीतियों के लिए प्रयास करना चाहिए, ऐसी नीतियों को उभारना चाहिए और मौजूदा सीमाओं में रहकर उन्हें लागू करना चाहिए। पश्चिम बंगाल की वाम मोर्चा सरकार का अनोखा रिकार्ड दिखाता है कि वह इस लक्ष्य की दिशा में गंभीरता से काम कर रही थी। बेशक, ऐसी वामपंथी सरकार का न रहना एक धक्का है। लेकिन, इसे न तो कोई स्थायी धक्का माना जा सकता है और बहुत बुनियादी नुकसान। सी पी आइ (एम) हमेशा से इसके महत्व पर जोर देती आयी है कि मेहनतकश जनता को उसके वर्गीय तथा जनसंगठनों के जरिए संगठित किया जाए और जन संगठनों व जनांदोलनों का विकास किया जाए और इस तरह जनता की राजनीतिक चेतना बढ़ायी जाए। वामपंथी नेतृत्ववाली सरकारों का गठन, ठीक इसी प्रक्रिया का हिस्सा है।
चुनाव नतीजों की आलोचनात्मक समीक्षा के बाद सी पी आइ (एम), बुनियादी वर्गों के मुद्दे उठाने और मेहनतकश जनता के हितों के लिए संघर्ष करने की दिशा में और उन्मुख होगी। वामपंथ का राजनीतिक मंच, कांग्रेस तथा भाजपा जैसी शासक वर्गीय पार्टियों के राजनीतिक मंचों के खिलाफ, इकलौता वैकल्पिक राजनीतिक मंच है। इस वैकल्पिक मंच में नव-उदारवादी आर्थिक नीतियों के खिलाफ संघर्ष, जनता की रोजी-रोटी की हिफाजत करना और राष्ट्रीय संप्रभुता व धर्मनिरपेक्षता की हिफाजत करना आदि, शामिल हैं।
प. बंगाल में बदली हुई परिस्थितियों में माकपा वाम मोर्चा के शासन में तीन दशक से ज्यादा में जनता को हासिल हुई उपलब्धियों की रक्षा करेगी। अब राज्य में सत्ता में आए गठबंधन की वर्गीय प्रकृति को देखते हुए, इसकी कोशिशें की जाने वाली हैं कि भूमि सुधारों को पलटा जाए और मेहनतकश जनता की उपलब्धियों को कमजोर किया जाए। हमें भूमि सुधारों की और बर्गादारों व खेत मजदूरों के अधिकारों की रक्षा करनी होगी। मजदूरों को अपने अधिकारों के लिए संघर्ष के लिए और ज्यादा संगठित करना होगा और जनता के सभी तबकों को अपनी रोजी-रोटी की रक्षा के लिए संघर्ष के लिए एकजुट करना होगा। धर्मनिरपेक्षता तथा सांप्रदायिक सद्भाव की विरासत की रक्षा करनी होगी और जनता की एकता व राज्य की अखंडता को तोडऩे पर आमादा फूटपरस्त ताकतों का मुकाबला करना होगा। यह सब वामपंथ की एकता को और मजबूत करने के जरिए हासिल किया जाएगा।
पार्टी और वाम मोर्चा की हिफाजत करो
चुनाव के बाद, सबसे पहला काम तो यही है कि पार्टी, वाम मोर्चा तथा पाश्चिम बंगाल में आंदोलन की रक्षा की जाए, जिन पर नये हमले शुरू भी हो चुके हैं। चुनाव नतीजों की घोषणा होते ही, हमारी पार्टी तथा ट्रेड यूनियनों के कार्यालयों पर बीसियों जगहों पर हमले हुए हैं। सी पी आइ (एम) तथा वाम मोर्चा के कार्यकर्ताओं व समर्थकों के खिलाफ हत्यारी हिंसा की मुहिम छेड़ दी गयी है। चुनाव के नतीजे आने के बाद, पहले दो दिन में ही सी पी आइ (एम) के दो नेताओं की नृशंसतापूर्वक हत्या की जा चुकी थी। तृणमूल काग्रेस चुनावी जीत का फायदा उठाकर अनेक इलाकों से सी पी आइ (एम) तथा वामपंथ का शारीरिक रूप से ही सफाया करना चाहती है। इसका मुकाबला करना होगा। इस तरह की हिंसा के खिलाफ पश्चिम बंगाल की जनता की जनतांत्रिक भावनाओं को सामने लाना होगा। समूची पार्टी, वामपंथ तथा देश की तमाम जनतांत्रिक शक्तियों को दृढ़तापूर्वक बंगाल में सी पी आइ (एम) तथा वामपंथ का साथ देना होगा, ताकि इस तरह के हमलों को विफल किया जा सके।
(लेखक सीपीआई (एम) के महासचिव हैं)









